डोनाल्ड ट्रम्प जिसे मिडिल-ईस्ट के लिए नई सुबह बता रहे हैं, वह अरब देशों में बिखराव की वजह भी बन सकती है


यूएई और बहरीन इजराइल के साथ डिप्लोमैटिक रिलेशन बना चुके हैं। अब अगर यह अनुमान लगाया जाए कि अक्टूबर में सऊदी अरब के शासन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) भी ऐसा ही करेंगे तो कुछ गलत नहीं होगा। इसमें कोई शक नहीं कि सऊदी अरब मिडिल ईस्ट की सबसे बड़ी ताकत है। और उसकी मर्जी के बिना यूएई और बहरीन इजराइल से समझौता नहीं कर सकते थे। दोनों देशों में राजशाही है। अब अगर सऊदी अरब भी इजराइल के साथ रिश्ते बना लेता है तो यह मध्य पूर्व में विघटन ही कहा जाएगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति पहले ही कह चुके हैं कि कुछ महीनों में पांच या छह अरब देश और इजराइल के साथ दोस्ताना रिश्तों की शुरुआत करेंगे। ट्रम्प इसे मिडिल ईस्ट में नई सुबह और विश्व शांति में एक नए दौर की शुरुआत बताते हैं।

पिता की सहमति का इंतजार
प्रिंस सलमान को दुनिया में एमबीएस के नाम से जाना जाता है। एमबीएस कोशिश कर रहे हैं कि पिता सलमान इजराइल से संबंध स्थापित करने के लिए राजी हो जाएं। वो उन्हें बता रहे हैं कि दुनिया कितनी बदल चुकी है। एमबीएस बताते होंगे कि डेमोक्रेटिक दौर में पत्रकार जमाल खशोगी कितना बड़ा खतरा बन गए थे और यमन कैसे हमलावर हो गया था। लेकिन, क्या ये बातें इतनी आसान हैं। यूएई और बहरीन को जनता की नाराजगी की फिक्र शायद ज्यादा नहीं है। लेकिन, सऊदी के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह दुनिया के 1 अरब 80 करोड़ मुस्लिमों से जुड़ा मामला हो जाता है।

ये इतना आसान नहीं
सऊदी के पॉलिटिकल एनालिस्ट अली शिहाबी कहते हैं- अगर एमबीएस इजराइल मामले में आगे बढ़ते हैं तो देश के परंपरावादी, जिहादी और ईरान इसे नहीं मानेगा। 2002 में अरब देशों ने फिलिस्तीन के मुद्दे पर नजरिया साफ कर दिया था। इजराइल से सामान्य रिश्ते रखना आसान नहीं होगा। कई बातों पर विचार करना होगा। व्हाइट हाउस में इजराइल और यूएई के अलावा बहरीन के नेताओं की जो सेरेमनी हुई, उसे फिलिस्तीन के नजरिए से नहीं देखा गया। दरअसल, अरब देशों के लिए समस्या उनके घर में ही है। कॉम्पटीशन है नहीं, टॉर्चर और करप्शन आम बातें हैं।

तो क्या ये ट्रम्प का ड्रामा है
अरब इजराइल संबंधों के लिए डोनाल्ड ट्रम्प और जेरेड कुशनर और इजराइल में अमेरिकी एम्बेसेडर डेविड फ्रेडमैन ने जमीन तैयार की। डेविड कहते हैं- इजिप्ट और जॉर्डन के बाद अगर दो और देश इजराइल से सामान्य संबंध बनाते हैं तो क्या गलत है। यहूदी और अरब जितना करीब आएंगे उतना बेहतर है। ये भी बहुत अच्छा संकेत है कि वेस्ट बैंक को इजराइल में मिलाने की योजना बेंजामिन नेतन्याहू ने रद्द कर दी। उन्होंने इस बात पर भी जोर नहीं दिया कि बहरीन और यूएई इजराइल को यहूदी राष्ट्र के रूप में मान्यता दें।

ट्रम्प की इतिहास में रुचि नहीं
यूएई या बहरीन से इजराइल को कभी दिक्कत नहीं रही। सवाल तो फिलिस्तीन का है। ट्रम्प और कुशनर इस बात को समझने तैयार नहीं हैं। फिलिस्तीन की समस्या को उन्होंने मजाक बना दिया है। वहां की लड़ाई ऐतिहासिक है और ट्रम्प प्रशासन को इतिहास की समझ नहीं है। लिहाजा, फिलिस्तीन कभी ट्रम्प की इन कोशिशों को स्वीकार नहीं करेगा। दरअसल, यह 65 लाख फिलिस्तीन लोगों का मामला है, जो गाजा के अलावा वेस्ट बैंक और इजराइल में रहते हैं। वर्तमान हालात से हल नहीं निकलेगा, कुछ देर मामला टल जाएगा। ये नई सुबह तो बिल्कुल नहीं होगी, जैसा दावा ट्रम्प करते हैं।

क्या जवाब देंगे ट्रम्प
फिलिस्तीनी नेता मोहम्मद अब्बास ताश के पत्तों से बने महल में बैठे हैं। एक दिन ये ढह जाएगा। अब्राहम लिंकन ने कहा था- हम साइसं, आर्ट और मेडिसिन को सपोर्ट करेंगे। हर शख्स से धैर्य और सम्मान की उम्मीद करते हैं। फिर चाहे वो किसी भी नस्ल, मजहब और संप्रदाय का हो। ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति से जो खुद साइंस और मेडिसिन का मजाक उड़ाता हो, और नस्लवाद और सांप्रदायिकता में यकीन रखता हो- जवाब की उम्मीद करना बेमानी है। दरअसल, ट्रम्प नामुमकिन चीजों के बारे में सोचने वाले हैं। नई सुबह के बारे में वे नहीं सोचते। अगर सऊदी-इजराइल डील होती है तो अक्टूबर में ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य टकराव की आशंका बढ़ जाएगी।

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